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18 March 2020, AAJ KA RASHIFAL । Today Horoscope | Daily/Dainik भविष्यफल in Hindi Suresh Shrimali
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दशामाता की पूजा, व्रत विधिः-चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को दशामाता का पूजन एवं व्रत करते हैं। स्त्रियाँ स्नानादि से निवर्त हो पूजन सामग्री ले कर दशामाता का पूजन करती हैं। एक पाटे- चोकी, पर पिली मिट्टी से एक दस कंगूरे वाला गोला बनाते हैं। फिर उन दस कंगुरों पर रोली, काजल, मेहँदी से टिकी-बिन्दी, लगा कर, उन पर दस गेहूं के आँखे रख कर, सुपारी के मोली लपेट कर गणेशजी बना कर रोली, मोली, मेहँदी, चावल से गणेश जी का पूजन कर दशामाता की कहानी सुनते हैं ऐसा प्रतिदिन दस दिन तक करते हैं। जों सूत की कुकडी हल्दी की गांठ होलिका दहन में दिखाते हैं उसी कुकडी को दस दिन कहानी सुनाकर पूजन कर दस तार का डोरा बनाकर उस पर दस गांठ लगाकर कहानी सुनने के बाद गले में पहन लेते हैं, अगली दशामाता व्रत तक पहने रहते हैं, फिर नया डोरा बनाकर पूजन कर दूसरा सूत का डोरा पहनते हैं। इस दिन व्रत रखा जाता हैं एक ही समय भोजन करते हैं।
दशामाता की कहानीः-राजा नल और दमयंती रानी सुखपूर्वक राज्य करते थे। उनके दो पुत्र थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संपन्न थी। एक दिन की बात है कि उस दिन होली दसा थी। एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा- दशा का डोरा ले लो। बीच में दासी बोली- हां रानी साहिबा, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजन और व्रत करती हैं तथा इस डोरे की पूजा करके गले में बांधती हैं जिससे अपने घर में सुख-समृद्धि आती है। अतः रानी ने ब्राह्मणी से डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजन करके गले में बांध दिया। कुछ दिनों के बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा हुआ देखा। राजा ने पूछा- इतने सोने के गहने पहनने के बाद भी आपने यह डोरा क्यों पहना? रानी कुछ कहती, इसके पहले ही राजा ने डोरे को तोड़कर जमीन पर फेंक दिया। रानी ने उस डोरे को जमीन से उठा लिया और राजा से कहा- यह तो दशामाता का डोरा था, आपने उनका अपमान करके अच्छा नहीं किया।
जब रात्रि में राजा सो रहे थे, तब दशामाता स्वप्न में बुढ़िया के रूप में आई और कहा तूने मेरा अपमान करके अच्छा नहीं किया। अब जैसे-तैसे दिन बीतते गए सुख-शांति सब कुछ नष्ट होने लगे। राजा ने नल-दमयंती अपने देश को छोड़कर चल दिए। रास्ते में भील राजा का महल दिखाई दिया। वहां अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया। आगे चले तो रास्ते में राजा के मित्र का गांव गए आदर-सत्कार के बाद रानी ने देखा मध्यरात्रि में बेजान खूंटी हार को निगल रही है। यह देखकर रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और राजा-रानी दोनों रात्रि को ही वहां से चल दिए। आगे चलने पर राजा नल की बहन का गांव आया। बहन ने थाली में प्याज-रोटी रखकर भैया-भाभी से मिलने आई। राजा ने तो अपने हिस्से का खा लिया, परंतु रानी ने जमीन में गाड़ दिया। चलते-चलते एक नदी मिली नदी में से मछलियां निकालकर रानी से कहा- तुम इन मछलियों को भुंजो, मैं गांव में से परोसा लेकर आता हुं, लेकर आते वक्त चील ने झपट्टा मारा तो सारा भोजन नीचे गिर गया। उधर रानी मछलियां भूंजने लगीं तो दुर्भाग्य से सभी मछलियां जीवित होकर नदी में चली गईं। दोनों ही आपस में एक-दूसरे के की मन की बात समझ कर आगे चल दिए। चलते-चलते रानी के मायके का गांव आया। राजा वहां तेली के घर और रानी राजमहल में दासी का काम करने लगी। अगले वर्ष जब दषामात का व्रत आया सभी रानियों के साथ दासी ने भी सिर धोकर स्नान किया। दासी ने रानियों का सिर गूंथा तो राजमाता ने कहा- मैं भी तेरा सिर गूंथ दूं। तब उन्होंने दासी के सिर में पद्म देखा और कहा मेरी के भी सिर में भी पद्म है। तब दासी ने कहा- मैं ही आपकी बेटी हूं। दशा माता के कोप से मेरे बुरे दिन चल रहे है आज मैं दशा माता का व्रत करूंगी तथा उनसे गलती की क्षमा-याचना करूंगी। अब दशामाता के आशीर्वाद से राजा नल और दमयंती के अच्छे दिन लौट आए। लौटते समय जहां रानी में मछलियों को भूना था वहां मछलियां और राजा के हाथ से चील के झपट्टा मारा भोजन जमीन गीरा था। राजा की बहन का गांव आया। तभी दमयंती ने उस जगह को खोदा, खोदने पर रोटी तो सोने की और प्याजे चांदी का हो गया। राजा अपने मित्र के घर पहुंचे रात्रि विश्राम मोरनी वाली खूंटी हार उगलने लगी तो राजा ने अपने मित्र को जगाया तथा रानी ने मित्र की पत्नी को जगाकर दिखाया। आपका हार तो इसने निगल लिया था। आपने सोचा होगा कि हार हमने चुराया है। वे भील से नल-दमयंती अपने बच्चों को लेकर अपनी राजधानी के निकट पहुंचे, तो नगरवासियों ने लाव-लश्कर के साथ उन्हें आते हुए देखा। सभी ने बहुत प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया तथा गाजे-बाजे के साथ उन्हें महल पहुंचाया। राजा का पहले जैसा ठाठ-बाट हो गया। राजा नल-दमयंती पर दशा माता ने पहले कोप किया, ऐसी किसी पर मत करना और बाद में जैसी कृपा करी, वैसी सब पर करना। जय बोलो दशामाता की जय।।
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दशामाता की कहानीः-राजा नल और दमयंती रानी सुखपूर्वक राज्य करते थे। उनके दो पुत्र थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संपन्न थी। एक दिन की बात है कि उस दिन होली दसा थी। एक ब्राह्मणी राजमहल में आई और रानी से कहा- दशा का डोरा ले लो। बीच में दासी बोली- हां रानी साहिबा, आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजन और व्रत करती हैं तथा इस डोरे की पूजा करके गले में बांधती हैं जिससे अपने घर में सुख-समृद्धि आती है। अतः रानी ने ब्राह्मणी से डोरा ले लिया और विधि अनुसार पूजन करके गले में बांध दिया। कुछ दिनों के बाद राजा नल ने दमयंती के गले में डोरा बंधा हुआ देखा। राजा ने पूछा- इतने सोने के गहने पहनने के बाद भी आपने यह डोरा क्यों पहना? रानी कुछ कहती, इसके पहले ही राजा ने डोरे को तोड़कर जमीन पर फेंक दिया। रानी ने उस डोरे को जमीन से उठा लिया और राजा से कहा- यह तो दशामाता का डोरा था, आपने उनका अपमान करके अच्छा नहीं किया।
जब रात्रि में राजा सो रहे थे, तब दशामाता स्वप्न में बुढ़िया के रूप में आई और कहा तूने मेरा अपमान करके अच्छा नहीं किया। अब जैसे-तैसे दिन बीतते गए सुख-शांति सब कुछ नष्ट होने लगे। राजा ने नल-दमयंती अपने देश को छोड़कर चल दिए। रास्ते में भील राजा का महल दिखाई दिया। वहां अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया। आगे चले तो रास्ते में राजा के मित्र का गांव गए आदर-सत्कार के बाद रानी ने देखा मध्यरात्रि में बेजान खूंटी हार को निगल रही है। यह देखकर रानी ने तुरंत राजा को जगाकर दिखाया और राजा-रानी दोनों रात्रि को ही वहां से चल दिए। आगे चलने पर राजा नल की बहन का गांव आया। बहन ने थाली में प्याज-रोटी रखकर भैया-भाभी से मिलने आई। राजा ने तो अपने हिस्से का खा लिया, परंतु रानी ने जमीन में गाड़ दिया। चलते-चलते एक नदी मिली नदी में से मछलियां निकालकर रानी से कहा- तुम इन मछलियों को भुंजो, मैं गांव में से परोसा लेकर आता हुं, लेकर आते वक्त चील ने झपट्टा मारा तो सारा भोजन नीचे गिर गया। उधर रानी मछलियां भूंजने लगीं तो दुर्भाग्य से सभी मछलियां जीवित होकर नदी में चली गईं। दोनों ही आपस में एक-दूसरे के की मन की बात समझ कर आगे चल दिए। चलते-चलते रानी के मायके का गांव आया। राजा वहां तेली के घर और रानी राजमहल में दासी का काम करने लगी। अगले वर्ष जब दषामात का व्रत आया सभी रानियों के साथ दासी ने भी सिर धोकर स्नान किया। दासी ने रानियों का सिर गूंथा तो राजमाता ने कहा- मैं भी तेरा सिर गूंथ दूं। तब उन्होंने दासी के सिर में पद्म देखा और कहा मेरी के भी सिर में भी पद्म है। तब दासी ने कहा- मैं ही आपकी बेटी हूं। दशा माता के कोप से मेरे बुरे दिन चल रहे है आज मैं दशा माता का व्रत करूंगी तथा उनसे गलती की क्षमा-याचना करूंगी। अब दशामाता के आशीर्वाद से राजा नल और दमयंती के अच्छे दिन लौट आए। लौटते समय जहां रानी में मछलियों को भूना था वहां मछलियां और राजा के हाथ से चील के झपट्टा मारा भोजन जमीन गीरा था। राजा की बहन का गांव आया। तभी दमयंती ने उस जगह को खोदा, खोदने पर रोटी तो सोने की और प्याजे चांदी का हो गया। राजा अपने मित्र के घर पहुंचे रात्रि विश्राम मोरनी वाली खूंटी हार उगलने लगी तो राजा ने अपने मित्र को जगाया तथा रानी ने मित्र की पत्नी को जगाकर दिखाया। आपका हार तो इसने निगल लिया था। आपने सोचा होगा कि हार हमने चुराया है। वे भील से नल-दमयंती अपने बच्चों को लेकर अपनी राजधानी के निकट पहुंचे, तो नगरवासियों ने लाव-लश्कर के साथ उन्हें आते हुए देखा। सभी ने बहुत प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया तथा गाजे-बाजे के साथ उन्हें महल पहुंचाया। राजा का पहले जैसा ठाठ-बाट हो गया। राजा नल-दमयंती पर दशा माता ने पहले कोप किया, ऐसी किसी पर मत करना और बाद में जैसी कृपा करी, वैसी सब पर करना। जय बोलो दशामाता की जय।।
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